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Ajab Gajab News-अजब-गजब: भारत के इस मंदिर को समुद्री यात्री कहते थे 'ब्लैक पगोडा', जाने क्या है इसके पीछे का रहस्य

डिजिटल डेस्क। भारत में ऐसे कई एतिहासिक मंदिर हैं, जो सदियों से लोगों के आकर्षण के केंद्र बने हुए हैं। इन्हीं में से एक कोणार्क का सूर्य मंदिर। यह भारत के चुनिंदा सूर्य मंदिरों में से एक है, जो उड़ीसा में जगन्नाथ पुरी से 35 किलोमीटर उत्तर-पूर्व में कोणार्क शहर में स्थित है। यह मंदिर ओडिशा की मध्यकालीन वास्तुकला का अनोखा नमूना है और इसी वजह से साल 1984 में यूनेस्को ने इसे विश्व धरोहर स्थल घोषित किया है। वैसे तो यह मंदिर अपनी पौराणिकता और आस्था के लिए दुनियाभर में प्रसिद्ध है, लेकिन इसके अलावा और भी कई वजहें हैं, जिनकी वजह से इस मंदिर को देखने के लिए दुनिया के कोने-कोने से लोग यहां आते हैं।  

लाल रंग के बलुआ पत्थरों और काले ग्रेनाइट के पत्थरों से बने इस मंदिर का निर्माण अब तक एक रहस्य ही बना हुआ है। हालांकि ऐसा माना जाता है कि इसे 1238-64 ईसा पूर्व गंग वंश के तत्कालीन सामंत राजा नरसिंह देव प्रथम द्वारा बनवाया गया था। वहीं, कुछ पौराणिक कथाओं के अनुसार, इस मंदिर को भगवान श्रीकृष्ण के पुत्र साम्ब ने बनवाया था। कोणार्क का मुख्य मंदिर तीन मंडपों में बना है। इनमें से दो मंडप ढह चुके हैं। वहीं, तीसरे मंडप में जहां मूर्ति स्थापित थी, अंग्रेजों ने स्वतंत्रता से पूर्व ही रेत और पत्थर भरवा कर सभी द्वारों को स्थायी रूप से बंद करवा दिया था, ताकि मंदिर और क्षतिग्रस्त न हो पाए।   

एक समय में समुद्री यात्रा करने वाले लोग इस मंदिर को 'ब्लैक पगोडा' कहते थे, क्योंकि ऐसा माना जाता है कि यह जहाजों को अपनी ओर खींच लेता था, जिसकी वजह से वह दुर्घटनाग्रस्त हो जाते थे। इसके पीछे कई पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं। कहा जाता है कि इस मंदिर के शिखर पर 52 टन का एक चुंबकीय पत्थर लगा हुआ था, जिसके प्रभाव से वहां समुद्र से गुजरने वाले बड़े-बड़े जहाज मंदिर की ओर खिंचे चले आते थे, जिससे उन्हें भारी क्षति हो जाती थी। कहते हैं कि इसी वजह से कुछ नाविक उस पत्थर को निकालकर अपने साथ लेकर चले गए। 

पौराणिक कथाओं के अनुसार, 52 टन का वह पत्थर मंदिर में केंद्रीय शिला का काम कर रहा था, जिससे मंदिर की दीवारों के सभी पत्थर संतुलन में थे। लेकिन इसके हटने के कारण, मंदिर की दीवारों का संतुलन खो गया और इसकी वजह से दीवारें गिर पड़ीं। हालांकि इस घटना का कोई एतिहासिक विवरण नहीं मिलता है और ना ही मंदिर में किसी चुंबकीय पत्थर के अस्तित्व का ही ब्यौरा कहीं उपलब्ध है। 



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